कडवा सत्य

जीवन के सत्य कभी कभी बडे कडवे होते है । ये कडवे सत्य कभी भी सामने आ सकते है । ये हमेशा याद रहे । यहा रिश्ता चाहे जो हो पर समय बुरा आ जाये तो कोई किसी का नही होता ।सबकें लियें स्वहित ही सर्वोपरी है ।लोगों के वांछित अवांछित उददेश्य कभी दृष्टव्य होते है पर वे अक्सर छिपे होते है और पारस्परिक व्यवहार के पीछे सक्रिय रहते है ।संघर्ष आपको करना है ।आपके संघर्ष में और उससे सामने आने वाले दुखों मे कोई आपका सहभागी बना रहे ये जरूरी नही है । सहभागी होने का नाटक यहां जरूर खुब खेला जाता है ।

इस कलयुग में इंसानी मन में देवत्व कम दानत्व बहुत अधिक है । धरती के दानवो का वध तो देवताओं ने कर दिया । मन में छिपे दानवों का वध तो वे भी नही कर सकतें ।देव भाव अब मन के कोने में दबा कुचला पडा है ।अतः अपने संपर्क के व्यक्ति के मन को पढो। उसमें छिपें हुये दानत्व को समझो ।उसके मकसद को जानो । ये ज्ञान काम आएगा । नवमीं हो या अष्टमी ।अब न राम आएगे ना ही श्री कृष्ण ।सतयुग और द्वापर में थोडे से ही दानव हुआ करते थे तो उनका विनाश संभव था सो वे आ गये थे पर अब तो मन मन में बसे इन दानवों का मुकाबला करना शायद उनके लिये भी संभव नही ।इसीलियें दानववृति से मुकाबला करने की मत सोचो। इनसे मुकाबला नही बच कर रहना ही अच्छा है ।

इस कडवे ज्ञान को समझने में कहीं देर ना हो जाये ।

एक दिन मेरी डायलिसीस के दौरान एक साथी रोगी की तवियत बिगड गई ।हार्ट रेट बहुत बढ़ जाने से उन्हें तेज घबसाहट हो रही थी । आई सी यू से एक डॉक्टर को भी बुला लिया गया ।थोडी देर बाद उन्हें हार्ट की देखभाल के लियें शिफ्ट किया जाने का फैसला ले लिया गया ।

मैंने टेकनीशियन मित्र से पुछा ये तो अकेले आते जाते है यदि इन्हें भर्ता करेगे तो इनकी देखभाल कोन करेगा १ जवाब और जानकारी दोनों चौकाने और मेरे जैसे बीमार के लिये स्तब्ध करने वाले थे।

उन्होने बताया देखभाल वार्ड का स्टॉफ करेगा ।क्योंकि इनकी माता ही इनकी देखभाल करती थी जिनकी पिछले दिनों मत्यु हो गईं ।ऐसे सेवा भावी स्टाफ को ढेर सारी दुआऐ ।

मित्र ने आगे यह भी बताया कि इनकी किडनी खराब होते ही इनकी पत्नि ने इनका परित्याग पहले ही कर दिया था ।वो इन्हे छोड कर चली गई ।

सुन कर लगा समुद्र मंथन की कहानी पुरानी कहां हुई .१ लोग तो आज भी अमृत पीने की लालसा लिये अपनों को छोड कर दानव बने वैसे ही तो भाग रहे है ।

एक स्वस्थ व्यक्ति जब क्रानिक बीमारी से ग्रसित होता है या पब कोई किसी भारी मुश्किल में उलझ जाये तो उसके अपने ही अपने रास्ते बदल लेते है । अमृत की चाह में कोन कब रिश्तों की डोर तोड दे और दूर भागने लगे विधाता ही जाने ।

रिश्तों का तो मतलब ही है परस्पर विश्वास जो भावनात्मक डोर से बंधें गुथे हो बिना किसी कुटिलता या कपटता के । पर जब कभी ऐसे हादसे देखने सुनने को मिलते है तो व्यथा चरम पर पंहुच जाती है ।इसलियें नकली संसारी रिश्ते तो जितनी जल्दी बेनकाब हो जाये अच्छा ही है ।वैसे भी अपेक्षा विहिनता जीवन जीने का सर्वोत्तम मार्ग है ।

सत्य का आभास स्वागत योग्य ही है चाहे फिर वो कितना भी कडवा क्यूं ना हो । अमृत पीने की चाह में जो भाग गये और जो भाग रहे है अमृत उनको ही मुबारक ।

कडवे सच को स्वीकार कर मेरे जैसे व्यक्ति तो नीलकंठ बन जाते है ।

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Author: harishdugesar

I am a lecturer of economics and fond of literature

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